देहरादून। देहरादून स्थित पर्यावरणीय घ्एक्शन और एडवोकेसी के मुद्दों पर कार्यररत एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उत्तराखंड के जनपद देहरादून स्थित आसन कंजर्वेशन रिजर्व एवं उसके इको-सेंसिटिव जोन के भीतर और आसपास खनन गतिविधियों से जुड़े कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों, पारिस्थितिक क्षरण और बढ़ती चिंताओं के संबंध में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। यह मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि 444 हेक्टेयर में फैलाघ् आसन कंजर्वेशन रिजर्व उत्तराखंड का पहला और वर्तमान में एकमात्र रामसर साइट है जो इसे वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त अंतरराष्ट्रीय महत्व की घ्वेटलैंड्स की श्रेणी में स्थापित करता है। रामसर साइट को यह मान्यता रामसर कन्वेंशन ऑन वेटलैंड्स के अंतर्गत प्राप्त होती है जो विश्वभर की पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण घ्वेटलैंड्स के संरक्षण और उनके सतत प्रबंधन पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संधि है।
जब वर्ष 2020 में आसन कंजर्वेशन रिजर्व को रामसर मान्यता प्राप्त हुई तब यह उत्तराखंड के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय उपलब्धि थी। आज भी उत्तराखंड में अनेक नदियाँ, झीलें और घ्वेटलैंड्स होने के बावजूद आसन राज्य की एकमात्र रामसर साइट बना हुआ है जो इसके असाधारण पारिस्थितिक महत्व को और अधिक रेखांकित करता है। अपने घ्पत्र में अनूप नौटियाल ने आसन कंजर्वेशन रिजर्व और यमुना नदी तंत्र से जुड़े आसपास के क्षेत्रों में लगातार दिखाई दे रहे खनन और पारिस्थितिक दबावों पर चिंता व्यक्त की है। इन दबावों में नदी तल का क्षरण, भारी मशीनरी की आवाजाही, बढ़ता मानवीय दबाव और व्यापक इको-सेंसिटिव परिदृश्य में हो रही खनन गतिविधियों के पारिस्थितिक प्रभाव शामिल हैं।
इस घ्पत्र में मुख्य रूप से आसन क्षेत्र के आसपास खनन गतिविधियों से संबंधित न्यायिक कार्यवाहियों से उत्पन्न चिंताओं को भी प्रमुखता से उठाया गया है। टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपद बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 14 फरवरी 2024 के अपने अंतरिम आदेश में यह निर्देश दिया था किष्आसन वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के 10 किलोमीटर के दायरे में कोई भी खनन गतिविधि तब तक संचालित नहीं की जाएगी जब तक परियोजना प्रस्तावक राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति औरध्या पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से आवश्यक अनुमति प्राप्त न कर ले। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि इस निर्देश को जारी करने का एक अतिरिक्त कारण यह था कि संबंधित घ्वेटलैंड को रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत रामसर साइट घोषित किया जा चुका है और इसलिए उसका विशेष पारिस्थितिक महत्व है।
इस विषय पर अनूप नौटियाल ने कहाघ् की आज हमारे सामने केवल खनन का प्रश्न नहीं है। यह पर्यावरणीय शासन व्यवस्था के भविष्य, संस्थाओं की विश्वसनीयता और संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। जब कानूनी सुरक्षा और लगातार उठती चिंताओं के बावजूद पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घ्कथित खनन का निरंतर दबाव झेलने लगते हैं, तब घ्अत्यधिक क्षति होने से पहले हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। पत्र में इको-सेंसिटिव क्षेत्र के भीतर और आसपास संचालित खनन गतिविधियों की स्वतंत्र जांच, विभिन्न स्वीकृतियों एवं अनुमतियों का सत्यापन, पारिस्थितिक आकलन और जवाबदेही तंत्र को मजबूत करने की मांग की गई है। वर्षों से एसडीसी फाउंडेशन उत्तराखंड से जुड़े महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दों और विकास संबंधी चुनौतियों को लगातार उठाता रहा है, साथ ही व्यावहारिक, सतत और प्रमाण-आधारित समाधानों की वकालत भी करता रहा है। संस्था जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, सतत परिवहन, पर्यावरणीय शासन, पारिस्थितिक संरक्षण, आपदा घ्प्रबंधन और हिमालयी राज्य में दीर्घकालिक सतत विकास जैसे विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य करती रही है।
